राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले देश में सिर्फ महिला चेतना की प्रतीक नहीं है. वह देश में शिक्षा की अलख जगाने वाली शुरुआती सुधारकों में से हैं. फिर भी बहुत सारे लोग उनसे, उनकी कहानी और संघर्ष से अनजान हैं।
दुनिया जितनी देखी, सुनी, समझी और पढ़ी, उसमें मेरे लिए सबसे महान दृश्य 170 साल पहले का है. जब 17 साल की राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्री ने अमानवीय प्रस्थापितो के गढ़ पुणे में हजारों साल से चली आ रही मनुवादी व्यवस्था को चैलेंज किया।वह गंजी पेठ से भीड़ेवाड़ा तक पुरुषों के हर अन्याय का डंके की चोट पर मुकाबला करते हुए लड़कियों और उपेक्षितों को पढ़ाने जाती थीं। उनकी वजह से आज देश के करोड़ों लोग, इंसान की जिंदगी जीने के काबिल हुए हैं।

यह 1826 की बात है. उस साल महाराष्ट्र के एक ईसाई मिशनरी समूह ने अपने अमेरिकी बोर्ड से अनुरोध किया कि वे किसी अविवाहित और अकेली अमेरिकी महिला को बॉम्बे भेजें, ताकि वहां उनकी लड़कियों के लिए एक स्कूल चलाया जा सके. थोड़ी हिचक और ना-नुकूर के बाद मैसाचुसेट्स के बॉस्टन शहर से सिंथिया फैरार नाम की एक 31 वर्षीय महिला को भारत भेजा गया. 29 दिसंबर, 1827 को वे बॉम्बे पहुंचीं. विरोधों के बावज़ूद 1829 तक उनके स्कूल शुरू किया।
भारत में अगर लड़कियों के लिए औपचारिक शिक्षा व्यवस्था के इतिहास की बात करें तो राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा और राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीबाई को मिस फैरार के बालिका विद्यालय से बहुत प्रेरणा मिली. राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा एक जगह स्वयं लिखते हैं – ‘अहमदनगर के अमेरिकन मिशन में मिस फैरार ने जो स्कूल चलाया, उसे मैंने अपने मित्रों के साथ देखा. जिस ढंग से उन लड़कियों को शिक्षा दी जाती थी, वह पद्धति मुझे बहुत अच्छी लगी.’ (स्रोत- भारतीय समाज-क्रान्ति के जनक राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा फुले, पृष्ठ-25, लेखक- डॉ. मु. ब. शहा, राधाकृष्ण प्रकाशन, 2013) राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीबाई को सगुणाबाई नाम की महिला से भी बहुत सहयोग मिला था. सावित्री और सगुणाबाई ने मिसेज मिशेल के नार्मल स्कूल से प्रशिक्षण भी लिया था. अगस्त, 1848 में पूना के बुधवार पेठ में राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा ने अछूत बच्चों के लिए एक स्कूल शुरू किया जो पूरे भारत में अपने ढंग का पहला स्कूल था। राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीबाई इसकी पहली शिक्षिका बनीं।
उल्लेखनीय है कि एक तरफ जहां ब्राह्मण समुदाय के कुछ मूढ़मति लोगों ने राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा का विरोध किया, वहीं उनके सबसे घनिष्ठ मित्र और सहयोगी भी देशस्थ ब्राह्मण समुदाय के ही रहे. इनमें सखाराम यशवंत परांजपे, सदाशिवराव बल्लाल गोवंडे, मोरो विट्ठल बालवेकर, बापुराव मांडे, मानाजी डेनाले और पंडित मोरेश्वर शास्त्री प्रमुख थे. (स्रोत- जोतिबा फुले, लेखक-मायाराम, प्रभात प्रकाशन, और मु. ब. शहा की उपरोक्त पुस्तक, पेज-28) पहली बार जब राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा का स्कूल विरोधों की वजह से बंद हुआ तो जुनागंज पेठ में सदाशिवराव गोवंडे नाम के देशस्थ ब्राह्मण ने ही उन्हें स्कूल के लिए अपनी जगह मुहैया कराई।

किसी भी देश या समाज के मानवीय विकास में महिलाएं सबसे अहम भूमिका अदा करती हैं. जिस घर-समाज-देश में महिलाएं पढ़ी लिखी होती हैं, उन्हें फैसले लेने का हक होता है, वह निरंतर विकास की दिशा में बढ़ता है. जिस समाज में स्त्री को महज उपभोग की वस्तु माना जाए और उससे जिंदगी जीने के सभी हक छिन जाएं वह समाज-देश हमेशा गुलामी और पतन पर रहता है. हमारे देश में हजारों सालों से महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया. उन्हें ताड़न का अधिकारी बनाया गया और हमारा देश लगातार सामाजिक गुलामी की श्रृंखलाओं में फंसता चला गया.

लगभग 2 हजार साल तक भारत की समाज-व्यवस्था को नियंत्रित करने वाले संविधान ‘मनुस्मृति’ के मुताबिक, “रात और दिन, कभी भी स्त्री को स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिए. उन्हें लैंगिक संबंधों द्वारा अपने वश में रखना चाहिए, बालपन में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र उसकी रक्षा करें, स्त्री स्वतंत्र होने के लायक नहीं है.”
– मनुस्मृति (अध्याय 9, 2-3)

मनु के इस संविधान के मुताबिक, सती प्रथा, विधवा केश वपन जैसी परंपराओं ने स्त्रियों को जानवरों से बदतर हालात में जीने के लिए मजबूर कर दिया गया था और उन्हें सच का एहसास ना हो इसलिए उनके पढ़ने लिखने के अधिकार भी छीन लिए गए थे. स्त्री इस गुलामी से बाहर ना निकल सके इसलिए उन्हें अपमानित कर समाज में उनकी प्रतिमा को मलिन किया गया. उनके चरित्र का हनन किया गया.

“पुरुषों को बहकाना स्त्रियों का स्वभाव होता है इसलिए बुद्धिमान स्त्रियों से सदा सावधान रहते हैं. चाहे पुरुष मूर्ख हो या विद्वान उसे काम-क्रोध से वश कर कुमार्ग में ले जाने के लिए स्त्रियां बड़ी समर्थ होती है. माता, बहन या लड़की के साथ भी एकांत में ना बैठें क्योंकि इनकी इंद्रिया इतनी प्रबल होती है कि विद्वान के मन को भी खींच लेती है.”
– मनुस्मृति (अध्याय 2, 213-214-215)

इस तरह के विचारों का 19वीं सदी तक समाज पर गहरा असर था।लेकिन इस गुलामी की पृष्ठभूमि तब दरकने लगी जब राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव फुले और उनकी पत्नी राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीबाई ने 1 जनवरी 1848 को पुणे के बुधवार पेठ के भिड़े वाड़ा में लड़कियों के पहले स्कूल की शुरुआत की. राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीबाई ने देश की पहली शिक्षिका बन मनू के काले कानून पर ऐसा तमाचा मारा कि आज मनु के कानूनों से गुलाम बनाई गई स्त्री और उपेक्षित कहलाने वाला राष्ट्रीय समाज भारत के हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा से योगदान दे रहे हैं. लगभग 168 साल पहले लड़कियों के लिए पहली स्कूल की शुरुआत करना इतना आसान नहीं था, लेकिन राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीमाई ने अपने पति राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा से प्रेरणा लेकर अथक संघर्ष किया और मनु के कानूनों के ठेकेदारों को कड़ी टक्कर देकर भारतीय महिलाओं की मुक्ति का दरवाजा खोला।
विशेष तौर पर केवल लड़कियों के लिए पहला विशाल स्कूल 1 जनवरी 1857 को बुधवार पेठ में राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा और राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रिमाई ने खोला। इस स्कूल के लिए जगह देनेवाले अण्णा साहब चिपलूणकर भी देशस्थ ब्राह्मण ही थे. (स्रोत- उपरोक्त डॉ. मु. ब. शहा की पुस्तक, पेज-26) राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीबाई जब घर से स्कूल और स्कूल से घर आती-जातीं तो उनपर गोबर और पत्थर फेंके जाते. एक पहरेवाला ब. स. कोल्हे नाम का एक गृहस्थ कुछ दिनों तक उनके साथ चलता रहा. राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रि बाई के इस महान कार्य को शिक्षा विभाग के जिस सरकारी अधिकारी ने सबसे पहले नोटिस किया और उसकी सराहना कर सबके सामने लाया वह भी एक देशस्थ ब्राह्मण दादोबा पांडुरंग तरबंडकर थे. दादोबा विख्यात व्याकरणकार और मराठी स्कूलों के विभागीय सचिव थे. उन्होंने 16 अक्तूबर, 1857 को राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा-राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीबाई के इन स्कूलों का मुआयना किया था।
राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सातारा जिले के नायगांव में जन्मी. 9 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई, राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव फुले से हुआ. राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव फुले के प्रेरणादायी साथ ने और उनसे मिली शिक्षा ने राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीआई को महिला और समाज की मुक्ति के लिए लड़ने की प्रेरणा दी. उन्होंने 1 जनवरी 1848 को लड़कियों का पहला स्कूल शुरू किया था. लेकिन यह उस दौर में इतना आसान नहीं था. फुले दंपति के इस काम का प्रस्थापितो ने जमकर विरोध किया जो उस वक्त लड़कियों की शिक्षा के खिलाफ थे।
महज 17 साल की उम्र में राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्री अपने घर से लड़कियों को पढ़ाने के लिए स्कूल जाती थीं. तब विरोधी रास्ते में उन्हें परेशान करने की कोशिश करते थे. वे उन्हें गंदी गालियां देकर अपमानित करते थे, कोई अपने घर से पत्थर फेंककर मारता था तो कोई गोबर फेंककर मारता था. लेकिन फिर भी राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्री इन सबका डटकर मुकाबला करते हुए रोज लड़कियों को पढ़ाने के लिए स्कूल जाती थी.

जब मनु के अनुयायियों को लगा कि राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्री और राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा अब रुकने वाले नहीं है तो उन्होंने राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा के पिता गोविंदराव पर यह कहकर दबाव बनाने की कोशिश की कि आप का लड़का धर्म के खिलाफ काम कर रहा है और इसके लिए आपका सामाजिक बहिष्कार हो सकता है, बहिष्कार के दबाव में गोविंदराव ने राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा को पाठशाला बंद करने को कहा. जब वे नहीं माने तो गोविंदराव ने उन्हें घर से निकल जाने के लिए कहा. राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा और राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीमाई ने घर छोड़ दिया लेकिन लड़कियों और उपेक्षितों को पढ़ाने का कार्य नहीं छोड़ा. जब इससे भी बात नहीं बनी तो लड़कियों की शिक्षा के विरोधियों ने फुले दंपति की हत्या करने के इरादे से कुछ गुंडो को उनके घर भेजा।
उस वक्त बहुत सारी लड़कियां महज 12-13 की उम्र में विधवा हो जाती थीं. इसके बाद उनका केशवपन कर उन्हें कुरूप बनाया जाता था. ताकि उनकी तरफ कोई पुरुष आकर्षित न हो सके. लेकिन ऐसी विधवा लड़कियां या महिलाएं भ्रष्ट सोच के पुरूषों के लिए आसान शिकार बन जाती थीं. ऐसे में गर्भवती हुई विधवाओं का समाज बहिष्कार कर देता था और उन पर जुल्म किए जाते थे. पैदा होने वाले बच्चे का भी कोई भविष्य नहीं होता था. ऐसे में उस गर्भवती विधवा के सामने सिर्फ दो पर्याय बचते थे. या तो वह उस बच्चे को मार दे या खुद आत्महत्या कर ले। इस अमानवीय नरसंहार से महिलाओं को बाहर निकालने के लिए राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा और राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीमाई ने गर्भवतियों के लिए प्रसूतिग्रह शुरू किया जिसका नाम था “बालहत्या प्रतिबंधक गृह” जो उन गर्भवती महिलाओं के लिए उनका घर भी था. राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीमाई ने इस घर को पूरी कुशलता और धैर्य के साथ चलाया. वहां के बच्चों को शिक्षा और उज्वल भविष्य दिया. विधवा केशवपन का विरोध करते हुए राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीमाई ने नाइयों की हड़ताल कराई और उन्हें विधवा केशवपन ना करने के लिए प्रेरित किया. आज भी गर्भवती विधवाओं के लिए ऐसे किसी गृह का निर्माण करना साहस का काम है इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि लगभग 150 साल पहले फुले दंपति का यह कदम कितना साहसिक था।

एक बार राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा ने एक ब्राह्मण गर्भवती महिला को आत्महत्या करने से रोका और उसे वादा किया कि होने वाले बच्चे को वह अपना नाम देंगे. राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावीत्रीमाई ने उस महिला को स्वीकार किया और उसे पूरी सहायता दी. कोई भी महिला अपने पति के इस कार्य को शक की नजर से देखकर उस महिला को नकार सकती थी लेकिन राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीमाईने उसे स्वीकारा. बाद में उस महिला से जन्मे बच्चे यशवंत को राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीमाई और राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा ने अपना नाम देकर उसकी परवरिश की उसे पढ़ा-लिखाकर डॉक्टर बनाया और अपना दत्तक पुत्र बना वारिसदार बनाया।
19 नवंबर, 1852 को पुणे महाविद्यालय के प्राचार्य मेजर कंठी ने एक विशाल समारोह में 200 रुपये का महावस्त्र और श्रीफल देकर राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा फुले व राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रिमाई का सम्मान किया था. ‘बॉम्बे गार्डियन’, पूना ऑब्ज़र्वर, ज्ञानप्रकाश और ज्ञानोदय जैसे तत्कालीन समाचार पत्रों ने राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबाफुले के इस कार्य की मुक्त कंठ से सराहना की. दिलचस्प है कि कुछ मूढ़मति और कट्टर ‘सवर्णों’ के उकसावे पर जिन दो लोगों ने राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा और राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले को जान से मारने की कोशिश की थी उनके नाम हैं- घोंडीराव नामदेव कुम्हार और रोद्रे. ये बात और है कि इनमें से एक हमेशा के लिए राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा का अंग-रक्षक बन गया और दूसरा राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा के ‘सत्यशोधक समाज’ का प्रबल समर्थक सिद्ध हुआ। छुआछूत, जातिवाद जैसी अमानवीय परंपरा को नष्ट करने के लिए अविरत काम करने वाले राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा का राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीमाई ने बराबरी से साथ निभाया. अस्पृश्यों को पानी पीने के लिए खुद के घर का जलाशय दे दिया. किसानों, मजदूरों की समस्याओं को लेकर संघर्ष किया।ज्योतिबा की मौत के बाद राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीमाई ने उनकी चिता को आग लगाई. यह क्रांतिकारी कदम उठाने वाली राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्री देश की पहली महिला थी. राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा की मृत्यु के बाद राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीमाई ने राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा के आंदोलन का नेतृत्व अपने हाथों में लिया और पूरी कुशलता से उसे निभाया. इसी दौरान उन्होंने “काव्य फुले” और “बावन कशी सुबोध रत्नाकर” नामक ग्रंथों का निर्माण कर समाज का प्रबोधन किया. और वह आधुनिक जगत में मराठी की पहली कवियत्री बनी।
ये सारे प्रसंग आज इसलिए कि जब हम भारतीय समाज को केवल नकारात्मक और संघर्षवादी नज़रिए से देखने लगते हैं तब उसकी सामासिक संस्कृति के मानवीय पहलुओं और प्रसंगों को नज़रअंदाज कर देते हैं. कई बार अनजाने में और कई बार जान-बूझकर भी. राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्री और राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा को एक-दूसरे के रूप में कितना सुंदर साथी मिला. दोनों ने लगातार और सप्रयास न केवल अपने प्रेमास्पद और सोद्देश्यात्मक दाम्पत्य को सींचा, बल्कि जब जिसका सहयोग मिला उससे लिया. उन्होंने सभी समुदाय के लोगों को अपनाया, सबसे सीखा. और इसलिए सभी समुदाय के लोगों ने उन्हें अपनाया, सहयोग दिया. उनका शुरुआती आक्रोश भी धीरे-धीरे पिघलकर एकतामूलक समाज की स्थापना हेतु बह चला. प्रतिक्रिया की जगह उनका कार्य रचनात्मक प्रबोधन का रहा-

राष्ट्रीय समाज के राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा के इस मराठी अभंग में इसी की झलक तो मिलती है –

‘मांग आर्यामध्ये पाहूं जाता खूण. एक आत्म जाण. दोघां मध्ये..

दोघे ही सारीखे सर्व खाती पिती. इच्छा ती भोगती सारखेच.

सर्व ज्ञाना मध्ये आत्मज्ञान श्रेष्ठ. कोणी नाही भ्रष्ट. जोती म्हणे..’

यानी उपेक्षित ,पिछड़े ,महार, मांग और प्रस्थापितो में कोई भेद नहीं. दोनों में एक ही आत्मा का निवास है. दोनों समान ढंग से खाते-पीते हैं. उनकी इच्छाएं भी समान होती हैं. जोति यह कहता है कि सारे ज्ञान में आत्मज्ञान श्रेष्ठ है, और कोई भी भ्रष्ट नहीं है, इसे जान लो।
एक समतामूलक समाज की रचना सबको जोड़ने से होगी, तोड़ने से नही।

1897 में पुणे में फैले प्लेग के दौरान राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता सावित्रीमाई दिन-रात मरीजों की सेवा में लगी थी. उन्होंने प्लेग से पीड़ित गरीब बच्चों के लिए कैंप लगाया था. प्लेग से पीड़ित बच्चे पांडुरंग गायकवाड़ को लेकर जब वह जा रही थीं तो उन्हें भी प्लेग ने जकड़ लिया. 10 मार्च 1897 को रात 9 बजे राष्ट्रीय समाज की राष्ट्रमाता क्रांतिज्योति सावित्रीमाई का देहांत हो गया. जिंदगी के आखिरी पलों तक यह राष्ट्रमाता मानवता को स्थापित करने के लिए लड़ती रही।।

II नमन वंदन II

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