राष्ट्रीय समाज के क्रांतिसूर्य महात्मा ज्योतिबा फुले की पुण्यतिथि पर सादर नमन!!!

महान समाज सुधारक एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी,सामाजिक कुरीतियों के विरोधी, विधवा विवाह नारी शिक्षा के प्रबल समर्थक, किसान निर्धनों दीन दुखियों एवं राष्ट्रीय समाज के उद्धारक प्रख्यात दार्शनिक लेखक शिक्षाविद महात्मा ज्योतिबा फूले जी की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि नमन।

राष्ट्रीय समाज के क्रांतिसूर्य महात्मा ज्योतिबा फुले की पुण्यतिथि पर सादर नमन!!!

जाति प्रथा,शिक्षा ,स्त्री-पुरुष असमानता और अंधविश्वास के साथ समाज में व्याप्त आर्थिक-सामाजिक एवं सांस्कृतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध सामाजिक परिवर्तन की जरूरत भारत में शताब्दियों से रही है. इस लक्ष्य को लेकर आधुनिक युग में सार्थक, सशक्त और काफी हद तक सफल आंदोलन चलाने का श्रेय प्रथमत: राष्ट्रीय समाज के महात्मा ज्योतिराव फुले को जाता है. उन्हें ज्योतिबा फुले या महात्मा फुले नाम से भी जाना जाता है. राष्ट्रीय समाज के प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता के लिए उनके चलाए आंदोलन के कारण उन्हें आधुनिक भारत की परिकल्पना का पहला रचनाकार भी माना जाता है. ये बात महत्वपूर्ण है कि बाबा साहेब डॉ बीआर आंबेडकर ने बुद्ध और कबीर के साथ राष्ट्रीय समाज के ज्योतिबा फुले को अपना गुरु माना था।
यह मानकर कि जाति व्यवस्था को धार्मिक और आध्यात्मिक आधार देने वाले से टकराए बगैर समाज में व्याप्त तरह-तरह की कुरीतियों का समाधान असंभव है, राष्ट्रीय समाज के महात्मा ज्योतिबा फुले ने धर्म को सीधी चुनौती पेश की।हजारों वर्षों से मिथक एवं पुराकथाएं जनसाधारण के लिए शास्त्र का काम करती आई हैं. इसे देखते हुए फुले ने ‘गुलामगिरी’ पुस्तक के माध्यम से, लोक प्रचलित मिथकों की पड़ताल की। इसके फलस्वरूप एक ऐसी चेतना का विस्तार हुआ हुआ, जो आगे चलकर देश के विभिन्न भागों में जातिविहीन आंदोलनों की प्रेरणा बना।
राष्ट्रीय समाज के महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म एक साधारण मौर्य परिवार में पुणे में हुआ था। राष्ट्रीय समाज को जातीय उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने के लिए फुले ने उन्हें संगठित होने और आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने की सलाह दी।अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले तथा अन्य सहयोगियों की मदद से उन्होंने कई शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। लड़कियों का पहला स्कूल खोलने का श्रेय उन्हें ही है।
राष्ट्रीय समाज के लोगों को अशिक्षा,जातीय भेदभाव, उत्पीड़न, भ्रष्टाचार आदि के विरुद्ध जागरूक करने हेतु जो पुस्तकें उन्होंने रचीं, उसकी लिस्ट इस प्रकार है. 1- तृतीय रत्न (नाटक, 1855), 2- छत्रपति राजा शिवाजी का पंवड़ा (1869),3- ग़ुलामगिरी(1873), 4- किसान का कोड़ा (1883), 5- सतसार अंक-1 और 2 (1885), 6- इशारा (1885), 7- सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक (1889), 8- सत्यशोधक समाज के लिए उपयुक्त मंगलगाथाएं तथा पूजा विधि (1887), 9-अंखड़ादि काव्य रचनाएं (रचनाकाल ज्ञात नहीं).तथा अन्य कई…
राष्ट्रीय समाज की शिक्षा को लेकर राजा राममोहन राय और केशवचंद सेन दोनों के विचार थे कि पहले समाज के उच्च वर्गों में शिक्षा के न्यूनतम स्तर को प्राप्त कर लिया जाए. ऊपर के स्तर पर शिक्षा अनुपात बढ़ेगा तो उसका अनुकूल प्रभाव निचले स्तर पर भी देखने को मिलेगा. अर्थशास्त्र की भाषा में इसे ‘रिसाव का सिद्धांत’ या ट्रिकल डाउन थ्योरी कहते हैं. इसके अनुसार, ऊपर के वर्गों की समृद्धि धीरे-धीरे रिसकर समाज के निचले वर्गों तक पहुंचती रहती है. ऐसा सोचने वाले ये भूल जाते थे कि प्राचीन काल में जब हर सामंती के बच्चे को अनिवार्यतः गुरुकुल जाना पड़ता था, तब का शिक्षानुपात लगभग शत-प्रतिशत होता था. वहीं,राष्ट्रीय समाज का शिक्षानुपात शून्य पर टिका रहता था. यानी शिक्षा के क्षेत्र में ट्रिकल डाउन थ्योरी भारत जैसे देश में सफल नहीं हो सकती क्योंकि ये जन्म से ही निर्धारित हो जाता था कि कौन पढ़ेगा और कौन श्रम करेगा और कौन शिक्षा प्राप्त करने वालों की सेवा करेगा।
राष्ट्रीय समाज के महात्मा फुले के प्रमुख उद्देश्य थे- राष्ट्रीय समाज को पाखंडवाद ,सूदखोर आदि की सामाजिक-सांस्कृतिक दासता से मुक्ति दिलाना, धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यों में पाखंड को खत्म करना,राष्ट्रीय समाज की महिलाओं को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करना, ताकि वे उन धर्मग्रंथों को स्वयं पढ़-समझ सकें, जिन्हें उनके लिए ही रचा गया है, सामूहिक हितों की प्राप्ति के लिए उनमें एकजुटता का भाव पैदा करना, धार्मिक एवं जाति-आधारित उत्पीड़न से मुक्ति दिलाना, पढ़े-लिखे युवाओं के लिए प्रशासनिक क्षेत्र में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना आदि. कुल मिलाकर ये सामाजिक परिवर्तन के घोषणापत्र को लागू करने का कार्यक्रम था।
राष्ट्रीय समाज को ज्योतिबा फुले पर भरोसा था. इसकी सबसे बड़ी वजह शिक्षा के क्षेत्र में किए गए उनके काम थे. इसलिए राष्ट्रीय समाज ने उनको उन्होंने हाथों-हाथ लिया. कुछ ही वर्षों में उनकी शाखाएं मुंबई और पुणे के शहरी, कस्बाई एवं ग्रामीण क्षेत्रों में खुलने लगीं. एक दशक के भीतर वह संपूर्ण महाराष्ट्र में पैठ जमा चुका था. समाज की सदस्यता सभी के लिए खुली थी, फिर भी गिरी ,गोसाई ,तेली,तमोली बनिया , कुनबी, माली ,धनगर, वंजारा ,कोहार ,कहार जैसी जातियां तेजी से उनसे जुड़ने लगीं।
ज्योतिराव अपना संदेश लोगों तक कैसे पहुंचाते थे, इसका एक रोचक किस्सा रोजलिंड ओ हेनलान ने अपनी पुस्तक में दिया है. एक बार फुले अपने मित्र ज्ञानोबा सासने के साथ पुणे के बाहर स्थित एक बगीचे के भ्रमण के लिए गए. वहां एक कुआं था, जिससे उस बगीचे की सिंचाई होती थी. जैसे ही दोपहर का अवकाश हुआ, सभी मजदूर खाना खाने बैठ गए. यह देख फुले कुएं तक पहुंचे और कुएं के डोल को चलाने लगे. काम करते-करते उन्होंने गाना भी शुरू कर दिया. मजदूर उन्हें देखकर हंसने लगे. फुले ने उन्हें समझाया, ‘इसमें हंसने जैसा कुछ नहीं है? मजदूर लोग काम करते हुए अकसर गाते-बजाते हैं. केवल मेहनत से जी चुराने वाले लोग ही फुर्सत के समय वाद्ययंत्रों का शौक फरमाते हैं. असली मेहनतकश जैसा काम करता है, वैसा ही अपना संगीत गढ़ लेता है.’।राष्ट्रीय समाज के माध्यम से फुले ने अपने विकास और मान-प्रतिष्ठा अर्जित करने का जो रास्ता करीब 146 वर्ष पहले दिखाया था, सामाजिक न्याय के संदर्भ में आज भी वह उतना ही जरूरी और प्रासंगिक है।
आज आपकी पुण्यतिथि है आप राष्ट्रीय समाज के पितृ पुरुष है आज राष्ट्रीय समाज पार्टी आपके विचारों का भारत , समतामूलक भारत गढ़ने में लगी है आपके रास्ते सत्यशोधन समाजप्रबोधन और राष्ट्रसंघटन के त्रिपिटक पर चलकर ….आओ सभी मिलकर इस महामानव महात्मा ज्योतिबा फुले जी के चरणों मे पुण्यतिथि निमित्त श्रद्धा सुमन अर्पित करे ।।।।

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